Jhande Ke Mele Ka Itihas : आखिर क्यों औरंगजेब से जुड़ा है झंडे के मेले का इतिहास पढ़ें पूरी कहानी

Jhande Ke Mele Ka Itihas : उत्तराखंड की राजधानी देहरादून वैसे तो कई चीजों को लेकर मशहूर है लेकिन यहां की संस्कृति और यहां चली आ रही परंपराएं इस राजधानी को और भी ज्यादा अलग बनाती है ऐसी ही एक परंपरा है यहां के ऐतिहासिक झंडे के मेले की । कहते हैं कि हर साल यहां लगने वाला झंडे का मेला 346 सालों से चला आ रहा है । समय का हिसाब देखकर जोड़ा जाए तो पता चलेगा कि यह मेला वाकई ऐतिहासिक है और इससे देहरादून का इतिहास भी जुड़ा है वही आज हम अपने इस लेख में आपको देहरादून में लगने वाले झंडे के मेले का पूरा इतिहास बताने जा रहे हैं

Jhande Ke Mele Ka Itihas : कहानी शुरू होती है 1646 से

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इतिहास की ये कहानी शुरू होती है सन 1646 जब सिखों के सातवें गुरु हर राय जी के घर में गुरु राम राय का जन्म हुआ पंजाब के किरतपुर साहिब में हुआ। होली के पांचवे दिन जन्मे श्री गुरु राम राय हर राय जी के सबसे बड़े पुत्र थे। श्री गुरु राम राय बचपन से ही लोगो को अपनी बातो से प्रभावित किया करते थे जहां भी उन्हें कोई दुखी इंसान दिखता था वह उसकी मदद करने पहुंच जाते थे। इसके आलावा उन्हें उनकी चमत्कारिक शक्तियों के लिए भी जाना जाता था। ऐसे ही समय जाता गया और समय के साथ श्री गुरु राम राय बड़े हो गए।ये वो समय था जब भारत में मुग़लो का राज हुआ करता था हर कोई मुग़लों के आगे सर झुका दिया करता था लेकिन श्री गुरु राम राय के जो पिता थे यानी श्री हर राय उन्होंने कभी भी मुगलों के आगे सिर नहीं झुकाया।

Jhande Ke Mele Ka Itihas : मुगल शासक औरंगजेब से भी दोस्ती

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लेकिन इतिहास के पन्नों में इस बात का उल्लेख है की मुगल शासक औरंगजेब श्री गुरु राम राय को बहुत मानता था वह गुरु राम राज जी की बातो और चमत्कारों से भी काफी प्रभावित था। औरंगजेब अक्सर श्री गुरु राम राय के साथ भ्रमण पर जाया करता था।एक बार कि बात है कि श्री हर राय जी को ये बता चला कि मुगल शासक औरंगजेब से श्री गुरु राम कि गुरु राम राय की नजदीकियां बढ़ गयी है। ये बात जानकर श्री हर जी को काफी गुस्सा आया एक दिन हुआ यह कि श्री गुरु राम राय दरबार में पहुंचे दरबार में पहुंचकर श्री गुरु राम राय ने अपने पिता के चरणों में प्रणाम किया लेकिन पिता तो गुस्सा थे और उन्होंने मुंह फेर लिया जब पिता ने मुंह फेरा तो श्री गुरु राम राय को बहुत आश्चर्य हुआ उन्होंने पिता से ऐसा करने का कारण पूछा कारण के जवाब में गुरु हर राय ने कहा कि तुमने गुरु ग्रंथ की बेअदबी की है और इसके खिलाफ जाकर तुमने मुगल दरबार में चमत्कार भी दिखाएं और मेरा ऐसा बेटा गद्दी पर नहीं बैठ सकता इसलिए मैं तुम्हारा मुंह नहीं देखना चाहता था।

Jhande Ke Mele Ka Itihas : औरंगजेब से नजदीकियों के कारण छोड़ना पड़ा था किरतपुर

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गुरु हर राय जी ने आगे अपनी कठोर आवाज में कहा कि जिधर तुम्हारा मुख है उधर चले। पिता की कठोर वाणी सुनकर श्री गुरु राम राय को बहुत दुख हुआ कहते हैं कि जैसे भगवान राम राजा दशरथ की बात सुनकर अयोध्या छोड़ चले गए थे वैसे ही श्री गुरु राम राय में अपने राज्य को छोड़कर पिता की आज्ञा मानना उचित समझा और सभी चीजों को त्याग कर श्री गुरु राम राय जी किरतपुर साहिब छोड़ कर चले गए।इतिहास में इस बात का उल्लेख है कि श्री गुरु राम राय किरतपुर छोड़कर लाहौर जा पहुंचे थे उस समय लाहौर भारत का हिस्सा हुआ करता था। वहीं जब औरंगजेब को इन सब बातो का पता चला उसे बहुत दुःख हुआ वह फौरन श्री गुरु राम राय से मिलने लाहौर जा पंहुचा। लाहौर पहुंचकर औरंगजेब ने श्री हुरु राम राय जी से मुलाकात की , और गुरु राम राय को यह आश्वासन दिया कि उन्हें हर सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।कहते हैं कि औरंगजेब श्री गुरु राम राय को इतना मानता था कि वह उनके लिए बहुत दिनों तक लाहौर में ही रहा था वह नियम से गुरु राम राय जी के साथ घूमने जाया करता था और उनकी ज्ञान भरी बाते सुना करता था।

Jhande Ke Mele Ka Itihas :  1676 में आए थे उत्तराखंड

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समय यूं ही जाता गया और श्री गुरु राम राय भ्रमण करते करते सन्न 1676 में उत्तखण्ड आ पहुंचे कहते हैं कि उस समय फतेहशाह टेहरी के राजा हुआ करते थेफतेहशाह जो थे वह साधु संतो काफी सम्मान किया करते थे जब राजा को पता चला कि श्री गुरु राम राय उत्तराखंड की दूँ घाटी में है तो वह फ़ौरन उनसे मिलने दून घाटी आ पंहुचा। राजा ने यहां पहुंचकर श्री गुरु राम राय से ये प्राथना की वह यही पर ठहर जाये , राजा ने प्राथना करके श्री हुरु राम राइ जी को 6 गांव धामावाला , मियांवाला पंडितवारी , खुड़बुड़ा राजपुर और चामासारी भेंट स्वरुप दान दिए , और फिर राजा के कहने पर श्री गुरु राम राइ जी ने दून घाटी में डेरा डाला और इस तरह दून घाटी से नाम देहरादून हुआ और इस तरह देहरादून असित्व में आया .

दूर-दूर से लोक पहुंचते थे श्री गुरु राम राय जी के पास

श्री गुरु राम राय के डेरे या कहे देहरादून में लोग दूर-दूर से अपनी अरदास लेकर आने लगे कहते हैं इन अरदासो को सुनने के लिए ही श्री गुरु राम राय जी ने धामा वाले में गुरुद्वारा साहिब का निर्माण करवाया और इसके बाद उन्होंने यहां पर झंडा चढ़ाने की रीत शुरू की , वहीं झंडे साहिब में लगने वाले मेले की जो रीत श्री गुरु राम राय जी के भक्तो ने शुरू की थी। दरअसल श्री गुरु राम राय का जन्म जो है होली के 5 दिन बाद हुआ था और इसलिए ही लोगों ने श्रद्धा अनुसार होली के 5 दिन बाद यहां उनके जन्मदिन के शुभ अवसर पर मेला आयोजित करने की रीत शुरू की 346 सालों से चली आ रही है नी रीत आज भी कायम है आज भी लाखो के संख्या में लोग श्रद्धा के साथ यहां आते है और श्री गुरु राम के जन्मदिन को खास बनाते है।

रहस्यमई तरीके से हुई थी मौत

 

मेले में आने वाले श्रद्धालु आज भी श्री गुरु राम राय जी के जनम से लेकर मृत्यु तक के किस्से लोगो को सुनाते है श्रद्धालु बताते हैं कि श्री गुरु राम राय के जीवन से लेकर उनके मरण तक की चमत्कारिक किस्से आज भी जेहन में आते है आज भी लोग गुरु राम राय जी के किस्सों को सुनाते है और बता ते है कि जब श्री गुरु राम राय जी ने अपनी देह को छोड़ा था तो उन्होंने अपनी पत्नी से एक बात कही थी उन्होंने कहा था कि मैं किसी की मदद करने जा रहा हूं और 10 दिन तक अपने शरीर में वास नहीं करूंगा इस दौरान ना तो मुझे कोई छुएगा और न ही कोई मुझे देखेगा श्री गुरु राम राय की बात मानते हुए उनकी पत्नी पंजाब कौर ने गुरु राम राय जी के भवन पर ताला लगा दिया था

श्री गुरु राम राय जी के बाद पत्नी पंजाब और ने संभाला था कार्यभार

लेकिन हुआ ये कि एक दिन श्री गुरु राम राय के भक्त दरबार साहिब में जा पहुंचे उन्होंने श्री गुरु राम राय के भवन का ताला तोडा और देखा कि रामक राइ जी अपने बिस्तर पर लेते हुए है फिर एक भक्त उनके पास जा पहुंचा और उसने कहा कि श्री हुरु राम राइ जीकि सांसे नहीं चल रही है इससे पहले पंजाब कौर कुछ कह पाती भक्तों ने राम राय जी के अंतिम संस्कार की तियारी कर ली भक्तों ने फिर श्री गुरु राम राय को अग्नि को समर्पित किया गया , कहते है कि जब श्री गुरु राम जी को अग्नि में विलीन किया गया तो उनकी आत्मा वहीं मौजूद थी . भक्त कहते है कि राम राय जी की आत्मा आज भी दरबार साहिब में वास करती है आज भी दरबार साहिब में उनकी गद्दी मौदूद है आज भी वह अपने भवन में भक्तो की समस्याओं को दूर करते है।इतिहास के पन्नों में इस बात का भी जिक्र आता है कि श्री गुरु राम राय के चले जाने के बाद उनकी पत्नी पंजाब कौर ने दरबार साहिब को संभाला था और उन्होंने ही यहां पर महंत के बने की प्रथा शुरू की थी पंजाब कौर के समय से अब तक दरबार साहिब के महंत बन चुके हैं जिनमें महंत देवेंद्र दास दसवें महंत के रूप में आज भी कार्य कर रहे हैं .

आज भी चली आ रही है यह परंपरा 

होली के ठीक 5 दिन बाद आज भी झंडे साहिब में मेला लगता है और झंडे जी चढ़ाए जाते हैं तो महन्त देवन्देर दास ही झण्डे जी को चढातें है . झंडा समारोह के लिए 27 मीटर लंबा साल के पेड़ की लकड़ी दूधली के पास के जंगल से लाई जाती है इसके बाद इस लकड़ी को नदी में दूध दही और पवित्र जल के साथ स्नान कराया जाता है और बड़ी श्रद्धा और प्रेम भाव के साथ कपड़ा लपेटा जाता है। मान्यता ऐसी है कि जिन महिलाओं को झंडे जी पर यह कपड़ा सिलने या फिर झंडा सिलने का मौका मिलता है वह अपने आप को काफी खुशकिस्मत मानती है इतना ही नहीं आपको जानकर हैरानी होगी कि झंडे जी के लिए जो झंडा सिला जाता है उसकी बुकिंग 100 साल पहले ही कर दी जाती , बुकिंग करने वाला तो नहीं रहता लेकिन पीड़िया इस फर्ज को निभाती है।झंडे जी पर चढ़ने वाला कपडा हर साल बदला जाता है लेकिन लकड़ी जो है हर 5 सालो में एक बार बदली जाती है। इसके अलावा यह बात भी दिलचस्प है कि जितना झंडा जमीन के ऊपर होता है दिखाई देता है उतना ही जमीन के नीचे भी होता है। पुरे विधि विधान के साथ झंडे लाखो लोगो की भीड़ के बीच झंडे जी चढ़ाये जाते है दरबार साहिब के महंत जो होते है वह झंडे को चढ़ाते है और श्रद्धालु श्री गुरु राम के प्रति अपनी श्रद्धा को व्यक्त करते है .

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