Sri Dev Suman Biography : कौन थे उत्तराखंड के भगत सिंह जिन्होंने नमक सत्यग्रह में हिस्सेदारी से लेकर लड़ी टिहरी राज्य की लड़ाई

Sri Dev Suman Biography : क्या आसान है शहादत की डगर पर चलना
क्या आसान है 84 दिन तक आमरण अनशन करना
क्या आसान है सारी प्रताड़ना सहकर राज्य को आजादी दिलाना
नहीं
लेकिन संभव है अगर व्यक्ति “श्री देव सुमन” जैसा हो वह व्यक्ति जिसने राज्य को आजाद कराने का ऐसा सपना देखा कि उस सपने में अपनी जिंदगी तक झोंकदी और आगे बढ़ कर टिहरी जिले को आजादी दिलाई।

इस व्यक्ति ने क्या कुछ न सहा , झूठे मुकदमें , जेल की सजा, जानवरो जैसे व्यव्हार हर वो प्रताड़ना जो इंसान तो तोड़दे इन सब के बावजूद श्री देव सुमन” ने आंदोलन का ऐसा राग छेड़ा की लोगों के दिल में देश भक्ति जगा दी और फिर वो कर दिखाया कि इनका नाम इतिहास के पन्नों में अमर हो गया और इन्हें उत्तराखंड का भगत सिंह कहा जाने लगा। आखिर कौन थे “श्री देव सुमन”जिन्होंने बेहद कम उम्र में टिहरी की आजादी का सपना देखा था।

तारीख थी 25 मई 1916 जब उत्तराखंड के टिहरी जिले के जोल गांव में बड़े वैध पंडित हरिराम बडोनी और तारा देव के घर में एक निन्नी सी किलकारी गुंजी , नाम रखा गया श्री दत्त बडोनी उर्फ़ श्री देव सुमन। श्री देव सुमन अपने घर में सबसे छोटे या कहे सबसे लाड दुलारे थे , श्री देव के दो बड़े भाई कमल नयन बडोनी और परशुराम बडोनी उन्हें खुद प्यार किया करते है। एक तरह से कहा जाये तो श्री देव सुमन के घर में आने से पिता हरिराम और माँ तारा देव का परिवार पूरा हो चला था।

कहते है श्री देव सुमन का जन्म उस समय काल में हुआ था जब टिहरी में गढ़वाल के राजशाही घराने का लोगो पर हुकुम चलता था। लिहाज़ा टिहरी के लोगो को राजशाही परिवारों के अनुसार ही चलना पड़ता था और क्यूंकी श्री देव सुमन भी टिहरी में ही जन्मे थे तो उन्हें और उनके परिवार को भी राजशाही के हुकुम का पालन करना ही पड़ता था।

Sri Dev Suman Biography :

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Sri Dev Suman Biography : 3 वर्ष की उम्र में ही उठ गया सर से पिता का साया

हालांकि श्री देव के पिता पेशे से डॉक्टर थे इसलिए घर में स्थिति ठीक थी। लेकिन ये ठीक स्थिति तब बिगड़ गया जब पंडित हरिराम बडोनी का हैजे की बीमारी से निधन हो गया। उस समय श्री देव केवल 3 वर्ष के थे। अब जिम्मेदारी पूरी तरीके से मॉं तारा देवी पर आ गई थी। माँ तारा देव ने श्रीदेव सुमन और उनके दो बड़े भाइयो को पढ़ाया लिखाया। दरअसल श्री देव ने अपनी शुरुआती पढाई टिहरी राज्य से ही की लेकिन उच्च शिक्षा के लिए वह देहरादून चले आये थे। देहरादून जाकर लगभग डेढ़ साल तक उन्होंने सनातन धर्म विद्यालय में अध्ययन का कार्य किया और शायद यही वो समय था जब श्री देव गाँधीवादी विचारधारा से प्रेरित हुए और उन्होंने पहली बार नमक सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लेकर अपनी हिस्सेदारी दी। आंदोलन में भाग लेने का असर कुछ ऐसा हुआ की शहर में उनके नाम के चर्चे होने लगे। परिडाम स्वरुप श्री देव सुमन को 14 दिन जेल में बिताने पढ़े। कहते है इन 14 दिनों में श्री देव सुमन ने ठान ली थी वह कभी भी अंग्रेजो या राजघरानो की दमन कारी नीतियों को स्वीकार नहीं करेंगे !

Sri Dev Suman Biography : अंग्रेजों के खिलाफ कलम से लड़ी लड़ाई

राजधानी दिल्ली में अध्यापक का कार्यभार सँभालते हुए श्रीदेव सुमन के अपनी कलम से अंग्रजो की नीतियों के खिलाफ अपनी आवाज उठाई और और हिंदी साहित्य से जुड़कर उन्होंने बहुत सारी समाज सेवी संस्थाओ जैसे हिमालय सेवा संघ, गढ़वाल सेवा संघ, राज्य प्रजा परिषद आदि की स्थापना की। श्री देव सुमन अंग्रेजो और राजघरानो से देश और टिहरी को आज़ादी दिलाने के लिटने समर्पित थे की उन्होंने एक बार ये बात कही थी की “यदि हमें मरना ही है तो अपने सिद्धांत और विश्वास की सार्वजनिक घोषणा करते हुए वरना श्रेष्ठ है” ।

Sri Dev Suman Biography :

अंग्रेजो द्वारा लगाये गये प्रतिबंधो को हटाने और लोगो को जागरूक करने के लिए श्री देव सुमन ये हर वो काम किया जो आज़ादी दिलाने के जरुरी था। और उनके इन सभी कार्यो का असर तब देखने को मिला जब साल 1939 में राज्य सरकार अत्याचारों के विरुद्ध टिहरी में एक संस्था “टिहरी राज्य प्रजा मंडल” की स्थापना हुई और श्री देव सुमन को प्रजा मंडल का अध्यक्ष चुना गया।अध्यक्ष पद रहते हुए श्री देव ने काबिलेतारीफ भूमिका निभाई और वह धीरे धीरे टिहरी के लोगो के बीच लोकप्रिय होने लगे , लोग ये जांनने लगे थे की श्री देव सुमन कोई आम आदमी नहीं है ये वो आदमी है जिसमे टेहरी आजादी दिलाने की जिद्द पकड़ ली है। अब हुआ ये की श्री देव सुमन की बढ़ती लोकप्रियता से अंग्रेजी शाशन और राज घराने परेशान होने लगे , राजघरानो की आंखो में “टिहरी राज्य प्रजा मंडल” के अध्यक्ष खटकने लगे थे और टिहरी के राजघराने को ये डर सताने लगा की जनता राज्य के खिलाफ आन्दोलन न कर दे और अपने इस दर को खत्म करने के लिए राजघराने ने अधिकारियो द्वारा श्री देव सुमन को बिना किसी सबूत के गिरफ्तार कर वा लिया हालांकि बाद में उन्हें बेल भी मिल गयी थी।

Sri Dev Suman Biography :

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Sri Dev Suman Biography : राजशाही हुकुमत के खिलाफ लड़ी लड़ाई

इतिहास के पन्नो में इस बात का उल्लेख का है की टिहरी के राजघराने और अंग्रेजी हुकूमत को श्रीदेव सुमन का इतना डर था की उन्होंने श्रीदेव सुमन को टिहरी राज्य से निष्कासित कर दिया था और साथ ही उनके टिहरी आने पर पाबन्दी भी लगा दी थी। जिसके चलते श्री देव सुमन को टिहरी जिला छोड़ना पड़ा लेकिन लगभग तीन साल बाद यानी साल 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन में हिस्सा लेकर श्री देव सुमन टिहरी में वापसी की और टिहरी के अंदर कूच किया। जहाँ एक बार फिर उनकी गिरफ़्तारी हुई। श्री देव सुमन को गिरफ्तार करने के बाद राजघराने के अधिकारियों और अंग्रेजी हुकूमत तो ने फर्जी गवाहों और झूठे मुकदमों के बलबूते पर 31 जनवरी 1944 को 200 दो सौ रुपया जुर्माना के साथ 2 साल का कारावास की सजा सुनाई। सजा के दौरान श्री देव सुमन को काफी प्रताडिट किया गया। लेकिन श्री देव ने हार नहीं मानी उनकी लगातार यही मांग रही की टिहरी के राजा तक उनकी बात पहुंचाई जाए लेकिन किसी ने एक न सुनी। जब उन्हें कोई रास्ता दिखाई नहीं दिया तो श्री देव सुमन राजघराने के विरोध में 3 मई 1944 से अपना ऐतिहासिक आमरन अनशन शुरू कर दिया, श्री देव सुमन के अनशन की बात भी प्रशासन को नहीं पची क्युकी उन्हें ये भय हुआ की अगर अनशन के चलते श्रीदेव सुमन की जेल में यदि मृत्यु हो गई तो जनता राजशाही के खिलाफ आंदोलन छेड़ देगी।

Sri Dev Suman Biography : अनशन तुड़वाने के लिए दांतो तले चबाने पड़े चने

आंदोलन से खुद को बचाने के लिए राजशाही ने श्रीदेव सुमन के सामने एक प्रस्ताव रखा और कहा की अगर वह अपना अनशन खत्म करते है तो उन्हें टिहरी के महाराजा के जन्मदिन के अवसर पर यानी 4 अगस्त को रिहा कर दिया जायेगा ! कहा जाये तो एक तरह से श्री देव सुमन को लालच दिया गया लेकिन राजशाही का ये लालच तब पानी पानी हो गया जब श्रीदेव सुमन ने रिहा होने का प्रस्ताव ठुकराते हुए ये बात कही की क्या मैंने अपनी रिहाई के लिए यह कदम उठाया है ऐसा माया जाल डालकर आप मुझे विचलित नहीं कर सकते अगर प्रजामंडल को रजिस्टर किए बिना मुझे रिहा कर दिया गया तो मैं फिर भी अपना अनशन जारी रखूंगा श्री देव सुमन की ये बात सुनकर प्रशाशन बोखला गया और फिर राजशाही अधिकारियो ने हर एक तरिके से जेल में बंद श्री देव सुमन को प्रतारित करने की कोशिश की।

Sri Dev Suman Biography : इतना ही नहीं प्रतारित करने के साथ ही उन्हें कुनैन के इन्ट्रावेनस इन्जेक्शन भी लगाए गए। इंजेक्शंस के कारण श्री सुमन पानी के पानी के लिए चिल्लाया करते थे लेकिन कोई भी उन्हें पानी नहीं देता था। धीरे-धीरे उनका शरीर कमजोर पड़ने लगा समय जाता गया और श्री देव सुमन अनशन पर डटे रहे लेकिन आखिरकार 25 जुलाई 1944 को शाम करीब 4:00 बजे श्री देव सुमन के शरीर ने उनका साथ छोड़ दिया और यह अमर सेनानी अपने देश और अपने सिद्धांतों की रक्षा के लिए कुर्बान हो गया।

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भागीरथी नदी में बहाया श्रीदेव सुमन का शव

कहते हैं की श्री देव सुमन की शहादत के बाद भी राजशाही हुकूमत का मन नहीं भरा और उन्होंने जनता के विद्रोह से बचने के लिए श्रीदेव सुमन का शव रात के अंधेरे में एक कंबल में लपेट कर भागीरथी नदी में फेंक दिया लेकिन जब यह खबर टिहरी की जनता तक पहुंची तो उनमें आक्रोश पैदा हो गया और उन्होंने राज्य के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया और असर यह हुआ कि 1 अगस्त 1949 को लोगों को राजशाही कुशासन से आजादी मिली और आखिरकार श्री देव सुमन की ज़िंदगी का टिहरी को आजाद टिहरी बनाने का सपना साकार हुआ। एक बार की बात है की टिहरी रियासत के जुल्मों के संबंध में जवाहर लाल नेहरू ने श्री देव सुमन के सामने ये बात कहीं थी की टिहरी राज्य के कैदखाने दुनिया भर में मशहूर रहेंगे, लेकिन इससे दुनिया में रियासत की कोई इज्जत नहीं बढ़ सकती। नेहरू की इस बात पर श्री देव सुमन ने अपनी बुलन्द करते हुए कहा था- “मैं अपने शरीर के कण-कण को नष्ट हो जाने दूँगा, लेकिन टिहरी के नागरिक अधिकारों को कुचलने नहीं दूँगा।”कहना गलत नहीं होगा की श्री देव सुमन ने जो खा वो करके भी दिखाया और अपना नाम इतिहास के पन्नो में अमर कर दिया।