Chipko Movement Anniversary : चमोली से शुरू हुए चिपको आंदोलन की मुख्य बातें, जो इतिहास के पन्नों में हो गई अमर, जानें

Chipko Movement Anniversary : उत्तराखंड राज्य भले ही छोटा सा राज्य हो लेकिन इस छोटे से राज्य से एक ऐसे बड़े आंदोलन की शुरूआत हुई जिसने आगे चलकर ऐसा रौद्र रूप लिया जिसने जंगल की कटाई के लिए आए ठेकेदारों को तो दूर खदेड़ा ही साथ ही इस आंदोलन की चिंगारी ने ऐसी लौ जलाई जिसके आगे केन्द्र की सरकार भी नतमस्तक हो गई और फौरन हिमालयी राज्यों के वनों में पेड़ों की कटाई पर 15 साल के लिए रोक लगा दी गई।

Chipko Movement Anniversary : पेड़ों को कटने से बचाने के लिए पेड़ों से चिपक गईं थी महिलाएं

Chipko Movement Anniversary :

उत्तराखंड राज्य में पर्यावरण के संरक्षण के लिए 1970 के दशक में आज ही के दिन यानी 26 मार्च से चिपको आंदोलन की शुरूआत हुई जिसके जरिए पेड़ों को कटने से बचाने के लिए पहले तो महिलओं ने पेड़ कटाई के लिए आए वन विभाग के ठेकेदारों को काफी समझाने का प्रयास किया लेकिन जब वे लोग नहीं माने तो महिलाएं खुद ही पेड़ से चिपक गई और ठेकेदारों से कह दिया की पेड़ों को काटने से पहले आपको हमें काटना होगा। पर्यावरण के प्रति प्रेम के इस अनोखे आंदोलन की शुरूआत चमोली जिले में सन 1973 में हुई थी जब जंगलों में अवैध रूप से पेड़ों की कटाई का काम शुरू किया गया। इस आंदोलन की खास बात ये थी की इसमें महिलाओं ने बढ़ चढ़कर भाग लिया और इस आंदोलन की नीव 1970 में मशहूर पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा, कामरेड गोविंद सिंह रावत के साथ ही चंडी प्रसाद भट्ट व गौरा देवी के नेतृत्व में हुई थी।

Chipko Movement Anniversary : 26 मार्च 1974 से शुरू हुआ था चिपको आंदोलन

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चिपको आंदोलन की मुख्य रूप से शुरूआत तब हुई जब 26 मार्च 1974 को चमोली के रेणी गांव में 2400 पेड़ों की कटाई के लिए वन विभाग के ठेकेदार पहुंचे। इस दौरान निलामी के बाद जब ठेकेदार पेड़ों की कटाई के लिए जा रहे थे तो गौरा देवी के नेतृत्व में 27 महिलाओं ने एकत्रित होकर ठेकेदारों को समझाने का काफी प्रयास किया की पेड़ों की कटाई ना करें लेकिन जब ठेकेदारों ने बात मानने से इंकार कर दिया तो गौरा देवी के कहने पर सभी महिलाएं अपने बच्चों सहित पेड़ों से चिपक गई और ठेकेदारों को चुनौती दी की पेड़ों पर आरी चलाने से पहले हमें काटना होगा। ऐसे में ठेकेदारों ने महिलाओं को हटाने का काफी प्रयास किया लेकिन जब महिलाएं नहीं मानीं तो ठेकेदारों को खाली हाथ ही लौटना पड़ा। जिसके बाद महिलाओं ने वन विभाग के अधिकारियों के सामने समस्याओं को रखा और धीरे धीरे पेड़ों को कटने से बचाने के लिए किया गया ये आंदोलन देशभर में चिपको आंदोलन के नाम से विख्यात हो गया।

Chipko Movement Anniversary : देशभर में आंदोलन ने छोड़ी थी गहरी छाप

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चमोली जिले से शुरू हुए इस आंदोलन का ऐसा असर हुआ की इस आंदोलन ने उस समय उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवंती नंदन बहुगुणा को भी इस मसले पर सोच विचार करने के लिए विवश कर दिया और उन्होंने मामले में विचार करने के लिए एक कमेटी का गठन करवाया जिसमें अधिकारियों को इस मामले की ​जिम्मेदारी सौंपी गई उस वक्त इस फैसले को उत्तरांचल के लोगों के हक में देखा गया और इसे आंदोलन की जीत माना गया। यही नहीं इस आंदोलन के प्रभाव का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है की उस वक्त केन्द्र की सरकार में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस आंदोलन का संज्ञान लेते हुए हिमालयी वनों में 15 सालों के लिए पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी थी। चमोली के रैणी गांव से शुरू हुए इस चिपको आंदोलन ने ऐसी छाप छोड़ी की फिर जंगलों को बचाने के लिए ये आंदोलन एकाएक अन्य प्रदेशों में भी शुरू हुआ और पर्यावरण संरक्षण के प्रति एक सफल प्रयास साबित हुआ।

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