शिक्षा के स्तर में गिरावट और छात्र संख्या कम होने की टिप्पणी पर अशासकीय स्कूल शिक्षकों का पारा चढ़ गया। माध्यमिक शिक्षक संघ ने महानिदेशक-शिक्षा बंशीधर तिवारी को ज्ञापन भेजते हुए शिक्षा निदेशक के पत्र को तत्काल वापस लेने की मांग की। संघ ने अशासकीय स्कूलों की उपलब्धियां गिनाते हुए उनके साथ हो रहे पक्षपात की ओर भी महानिदेशक का ध्यान खींचा है।
संघ ने सीएम पुष्कर सिंह धामी, शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत को भी पत्र भेजते हुए आपत्ति जताई है। संघ के प्रदेश अध्यक्ष अनिल शर्मा और महामंत्री जगमोहन सिंह रावत ने महानिदेशक को चार पेज का पत्र भेजते हुए कार्यवाही की मांग की है। मालूम हो कि दो रोज पहले शिक्षा विभाग ने सभी सीईओ को अशासकीय स्कूलों की समीक्षा के बाबत दिशानिर्देश जारी किए हैं।
पत्र में चिंता जताई गई है कि सालाना भारीभरकम अनुदान के बावजूद अशासकीय स्कूलों में शैक्षिक गुणवत्ता और छात्र संख्या संतोषजनक नही है। शिक्षा निदेशक ने सीईओ को प्रतिदिन पांच पांच स्कूलों के प्रधानाचार्य केा बुलाकर समीक्षा करने को कहा है। आपके अपने अखबार हिन्दुस्तान ने नई व्यवस्था पर प्रमुखता से रिपोर्ट प्रकाशित की है।संघ अध्यक्ष ने कहा कि शिक्षा निदेशालय के पत्र की भाषा काफी आपत्तिजनक है।
पत्र के अनुसार अशासकीय विद्यालयों में शिक्षा का स्तर न्यून है, लिखा गया है। यह आपत्तिजनक है। अशासकीय स्कूल संसाधनों की कमी के बावजूद परीक्षाफल, अन्य पाठ्य सहगामी क्रियाओं में राष्ट्रीय स्तर तक प्रदर्शन, अनुशासन, स्वच्छता, समाज में मान्यता एवं स्वीकार्यता राजकीय विद्यालयों की अपेक्षा हर प्रकार से बेहतर है।
उन्होंने कहाकि अशासकीय विद्यालयों के शिक्षकों एवं कर्मचारियों को समीक्षा से कोई आपत्ति नहीं है। समीक्षा पहले भी होती रही है। लेकिन हर विद्यालय में प्रत्येक तीन वर्ष बाद होने वाले तीन दिवसीय नामिका निरीक्षण अब क्यों नहीं होते हैं? इसलिए पत्र को तत्काल वापस लिया जाये। समीक्षा करना विभाग का अधिकार है, उसी सामान्य रूप में परीक्षाफल और अन्य अपेक्षित प्रगति की नियमित समीक्षा की जाये, उस पर हमें कोई आपत्ति नहीं है।
निवेदन यह भी है कि राजकीय विद्यालयों से अशासकीय विद्यालयों की उपलब्धियों की तुलना भी की जाए। यदि निदेशक महोदय का आपत्तिजनक भाषा वाला यह पत्र वापस नहीं हुआ तो अशासकीय विद्यालयों के शिक्षक विद्यालय, जनपद और प्रदेश स्तर पर चरणबद्ध तरीके से आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।
ये भी उठाए मुद्दे:
1. सरकार और शासन द्वारा राजकीय विद्यालयों के छात्र-छात्राओं को टेबलेट, पाठ्य-पुस्तकें, रमसा के अंतर्गत अन्य सुविधाएं प्रदान की जा रही है और अशासकीय विद्यालयों के छात्र-छात्राओं को इन तमाम सुविधाओं से वंचित कर दोहरा एवं सौतेला मापदण्ड अपनाया जा रहा है।
2. राजकीय विद्यालय में मिल रही इन सुविधाओं के आकर्षण और लालच में कुछ बच्चे अशासकीय विद्यालय को छोड़कर राजकीय विद्यालय में चले जाते हैं। इसके बावजूद समाज के अनुपातिक रूप से अधिकांश छात्र-छात्राओं का रुझान अशासकीय विद्यालयों की ओर ही है।
3.राजकीय विद्यालय अपने यहाँ छात्रों के प्रवेश में कड़े मानक प्रयोग करते हैं और अपेक्षाकृत कमजोर विद्यार्थियों को प्रवेश नहीं देते। इस प्रकार के कमजोर छात्रों को भी अशासकीय विद्यालय अपने यहां प्रवेश देकर उन्हें बेहतर बनाने का भरसक प्रयत्न करते हैं।
4. राजकीय विद्यालयों में कक्षा वर्ग का मानक अधिकतम 60 छात्रों पर एक सेक्शन है, जबकि अशासकीय विद्यालयों में यही मानक 90 छात्रों पर है। अशासकीय विद्यालयों के प्रति यह अन्याय है।
5. हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट बोर्ड परीक्षा में राजकीय विद्यालयों की अपेक्षा ये अशासकीय विद्यालय ही अपने केंद्रों पर विशाल संख्या में परीक्षार्थियों की परीक्षा सम्पन्न करा पाते हैं।
6. शिक्षा में विभाग द्वारा समय समय पर लाये जाने वाले अभिनव प्रयोगों के कार्यान्वयन में अशासकीय विद्यालय राजकीय विद्यालयों से कहीं कम नहीं है।
7. अशासकीय विद्यालयों के शिक्षकों/कर्मचारियों को एक्ट के अनुसार राजकीय की भाँति मिलने वाली सुविधाओं के मामले में भी शासनादेश केवल राजकीय के लिए निकलता है। उसके बाद अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए अशासकीय शिक्षकों/ कर्मचारियों को अलग से संघर्ष करना पड़ता है। तीन विशेष अवकाश का आदेश अशासकीय विद्यालयों के लिए राजकीय से तीन वर्ष बाद निकला। पति-पत्नी दोनों को आवास भत्ते के लिए भी शासनादेश केवल राजकीय के लिए निकला।
8.आयुष्मान गोल्डन कार्ड की सुविधा से अशासकीय विद्यालय अभी वंचित हैं। पहले से मिलने वाले तदर्थ सेवा के लाभों से वंचित किया जा रहा है। चयन-प्रोन्नत वेतनमान पर वित्त विभाग की अनापत्ति के बावजूद एक वेतनवृद्धि नहीं दी जा रही है।
9. अशासकीय विद्यालयों के शिक्षक और कर्मचारियों का दोहरा शोषण हो रहा है। एक तरफ सरकार, शासन एवं विभाग उनके साथ सौतेला व्यवहार करता है तो दूसरी ओर प्रबन्ध समितियां उनका निरन्तर उत्पीड़न करती हैं। सत्रांत लाभ सरकार दे भी रही है, लेकिन प्रबन्ध समिति की इच्छा पर।